सुप्रीम कोर्ट के कौन किस नोटिस से फूलने लगे बीजेपी के हाथ-पांव! क्या है क्रीमी लेयर जिससे OBC बाहर, SC-ST पर भी खतरा ?
ओबीसी के बाद अब SC-ST में भी क्रीमी लेयर को आरक्षण से दूर करने की बात उठने लगी है. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने याचिका लगाई है.

अनुसूचित जाति यानी SC, अनुसूचित जनजाति यानी ST, अदर बैकवर्ड क्लास यानी ओबीसी-इन तीन कैटेगरी में आरक्षण की बात तब हुई थी जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू की थी. भारत में आरक्षण की शुरूआत मंडल कमीशन से ही हुई जिसमें एससी को 15 परसेंट, एसटी को 7.5 परसेंट और ओबीसी को 27 परसेंट आरक्षण मिलना शुरू हुआ था. तब से जाति आधारित आरक्षण का यही सिस्टम चल रहा है.
इस सिस्टम में दूसरा बड़ा बदलाव 2019 में हुआ जब 103वें संविधान संशोधन के जरिए आर्थिक आधार पर 10 परसेंट आरक्षण दिया जाने लगा. अक्सर कहा जाता है कि आरक्षण की लिमिट टूट चुकी है, लेकिन 10 परसेंट EWS को जातीय आरक्षण से अलग रखा गया.
क्रीमी लेयर पर चर्चा कब से हुई?
जाति आधारित आरक्षण में क्रीमी लेयर की शुरूआत 1993 में हुई. आरक्षण की मंडल कमीशन वाले सिस्टम को चुनौती देने वाले इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने मंडल कमीशन की सिफारिशों के आधार पर OBC आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन क्रीमी लेयर को बाहर करने पर जोर दिया. तब पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने ये व्यवस्था बनाई कि ओबीसी में के वो लोग संपन्न हैं उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. एक लाख से शुरू हुआ ये कैप अब बढ़कर 8 लाख आमदनी वालों पर लागू है. मतलब जिन ओबीसी की आय 8 लाख से ज्यादा है उनको आरक्षण का फायदा नहीं मिलेगा.
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क्रीमी लेयर का बेसिक कॉन्सेप्ट उन ओबीसी के लिए बना जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से इतने उन्नत हो चुके हैं कि उन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं रही. क्रीमी लेयर वाले सिस्टम से ओबीसी के संपन्न लोग आरक्षण से बाहर हुए लेकिन SC-ST में क्रीमी लेयर का कॉन्सेप्ट लागू नहीं हुआ. सुप्रीम कोर्ट से ये तय हो सकता है कि क्या SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर व्यवस्था लागू होगी या क्या होगा?
अब SC-ST में संपन्न लोगों को आरक्षण देने पर सवाल
अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगी है कि SC-ST में भी जो लोग संपन्न हैं उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिले. दलील दी गई कि SC-ST में आरक्षण का फायदा संपन्न लोग उठा रहे हैं जबकि गरीब पीछे छूट रहे हैं. याचिका बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने लगाई है. इस दलील के साथ कि SC/ST के जिन परिवारों के सदस्य पहले से ही सरकारी या संवैधानिक पदों पर हैं, उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए, ताकि लाभ वास्तव में पिछड़े लोगों तक पहुंच सके. आरक्षण का मकसद दबे-कुचले वर्गों को मजबूत बनाना था लेकिन संपन्न होने के बाद भी परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी फायदा उठा रहे हैं.
क्रीमी लेयर यानी संपन्न लोगों को आरक्षण क्यों?
ये बहस लंबे अरसे से चल रही है. सुप्रीम कोर्ट ने अब इसे सुनवाई के लिए मंजूर किया है. ये संभव है कि इस केस की सुनवाई के दौरान आरक्षण सिस्टम, क्रीमी लेयर पर नए सिरे से कोर्ट रिव्यू करके अपना फैसला दे. याचिका को सुनवाई के लिए मंजूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से चार हफ्ते में उनका जवाब मांगा है. CJI सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच में केस की सुनवाई कर रही है.
आरक्षण आया भी राजनीतिक लोगों के राजनीति के लिए. आरक्षण के आंदोलन भी राजनीतिक कारणों से भी हुई, लेकिन किसी पार्टी ने आरक्षण की आग में हाथ जलाने की हिम्मत नहीं की. 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी का बीजेपी के खिलाफ चलाया गया कैंपेन हिट रहा कि 400 सीटें इसलिए चाहिए कि संविधान बदलकर आरक्षण खत्म कर सकें. माना जाता है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी बहुमत से बस इसी से चूक गई.
सुप्रीम कोर्ट में दायर केस में सबसे ज्यादा परीक्षा बीजेपी की ही होनी है. केंद्र में बीजेपी की सरकार है. सबसे ज्यादा राज्यों में उसकी सरकारें है. उसे स्टैंड लेना होगा कि वो SC-ST में क्रीमी लेयर के पक्ष में हैं या नहीं. ये स्टैंड लेना आसान रहेगा कि जो जैसा चल रहा है वो ठीक है. ये स्टैंड लेना हाथ पैर फूलाने जैसा या राजनीतिक जोखिम जैसा हो सकता है कि क्रीमी लेयर कॉप्सेप्ट लागू किया जाना चाहिए. ऐसा करने से SC-ST के संपन्न लोगों का आरक्षण जाएगा. इसका राजनीतिक असर बीजेपी को ही झेलना होगा कि वो आरक्षण खत्म करा रही है.
केंद्र सरकार की पॉलिसी अब तक क्लियर है जो पिछले साल अगस्त में बताई गई थी. तब सरकार ने कहा था कि एससी और एसटी कोटे में क्रीमी लेयर का कोई प्रोविजन नहीं है. मतलब कौन कितना अमीर है, कितना गरीब इस पर आरक्षण का बंटवारा नहीं होगा. जो SC-ST में है उन सबको आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा. अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार को एक बार फिर क्लियर करना होगा.
कोटे के अंदर कोटा
पिछले साल अगस्त में जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली सात जजों की बेंच ने राज्यों को छूट दी थी कि वो अनुसूचित जाति के कोटे के अंदर सब-कैटेगरी बना सकते हैं. जस्टिस बीआरगवई ने कहा था कि राज्यों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ग्रुप के अंदर क्रीमी लेयर की पहचान करने और उन्हें रिजर्वेशन के फायदों से वंचित करने के लिए भी एक पॉलिसी बनानी चाहिए. राज्यों को ये अधिकार मिला कि वो अनुसूचित जातियों के भीतर सबसे अधिक पिछड़े समूहों को अतिरिक्त आरक्षण दें. ताकि आरक्षण का लाभ केवल कुछ चुनिंदा जातियों तक सीमित न रहें, बल्कि सबको मिले. इस पर कुछ राज्यों ने एक्शन लिया लेकिन ज्यादातर राज्यों में इस पर काम नहीं हुआ.
बीआर गवई ने खुलकर की थी इसकी वकालत
बीआर गवई ऐसे चीफ जस्टिस रहे जिन्होंने खुलकर इस बात की कि वकालत की कि अनुसूचित जातियों (SC) के आरक्षण में भी क्रीमी लेयर लागू किया जाना चाहिए। ताकि आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न लोगों को लाभ न मिले. आरक्षण का असली फायदा जरूरतमंदों को मिले. हालांकि इस आइडिया के लिए जस्टिस गवई ने बहुत विरोध झेला. यहां तक खुद दलित समुदाय से विरोध हुआ. इतना तक सुनना पड़ा कि वो खुद तो आरक्षण का लाभ उठाकर चीफ जस्टिस बन गए. अब क्रीमी लेयर लागू करने की मांग कर रहे हैं.
देश में अभी किसे कितना आरक्षण?
- अनुसूचित जाति (SC) : 15%
- अनुसूचित जनजाति (ST) : 7.5%
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) : 27%(क्रीमी लेयर छोड़कर)
- आर्थिक रूप से कमजोर(EWS) : 10%
- कुल आरक्षण: 60%
क्रीमी लेयर क्या है?
- केवल OBC पर लागू
- 8 लाख+आमदनी वाले OBC क्रीमी लेयर
- OBC क्रीमी लेयर को आरक्षण का लाभ नहीं
सुप्रीम कोर्ट में क्या केस?
- SC-ST के लिए क्रीमी लेयर नहीं
- SC-ST में भी क्रीमी लेयर लागू करने का मांग
- क्रीमी लेयर लागू होने से संपन्न SC-ST आरक्षण से बाहर
- केवल जरूरतमंद को फायदा मिलने की दलील










