Shesh Bharat: केरल में लोकल चुनाव हारते ही बदला लेफ्ट का मूड, CM विजयन को किया साइडलाइन!

Shesh Bharat: केरल विधानसभा चुनाव से पहले सीपीएम ने मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को सीएम पद का चेहरा न बनाने का फैसला लिया है. हालिया चुनावी हार और कांग्रेस की मजबूती के बाद लेफ्ट दबाव में है. पार्टी चुनाव के बाद मुख्यमंत्री तय करेगी.

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Shesh Bharat: कम्युनिस्ट पार्टी का हर सदस्य सिर्फ कॉमरेड होता है. पी विजयन ऐसे लेफ्ट नेता हैं जिन्हें कैप्टन पुकारा जाता है. लीडरिशप स्किल और क्राइसिस मैनेजमेंट जैसे स्किल्स के कारण कैप्टन कहा जाता है. जबकि कम्युनिस्ट विचारधारा में कैप्टन जैसी उपाधि अच्छी नहीं मानी जाती. विजयन की पीएम मोदी से बड़ी दोस्ती रही है. उन्हें केरल का धोती वाला मोदी और सोवियत संघ के कम्युनिस्ट नेता रहे स्टालिन के नाम पर केरल का स्टालिन भी पुकारा जाता है.

2011 में बंगाल का किला ध्वस्त होने के बाद केरल ऐसा अकेला राज्य बना था जहां लेफ्ट की सरकार है. ऐसे दौर में लेफ्ट ने दो-दो बार लगातार चुनाव जीतकर सरकारें बनाईं जब देश में बीजेपी की लहर प्रचंड थी और कांग्रेस कमजोर हो रही थी. कॉमरेड पिनाराई विजयन केरल की तूफानी जीत के आर्किटेक्ट बने थे. एक बार फिर विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं लेकिन लेफ्ट का सारा गणित, समीकरण कांग्रेस ने हवा कर दिया. विधानसभा चुनाव से पहले लोकल चुनावों में कांग्रेस की तूफानी जीत से लेफ्ट एकदम पैनिक में हैं. बड़े चुनाव से लेफ्ट ने सन्न करने वाला फैसला लिया है. 

व्यक्ति से बड़ा दल, दल से बड़ा देश-ये बीजेपी की लाइन है लेकिन फॉलो लेफ्ट करता रहा. एक वक्त था 1996 में जब बंगाल के सीएम ज्योति बसु को देश का पीएम बनाने की बात हुई थी लेकिन तब लेफ्ट ने फैसला किया कि ज्योति बसु पीएम नहीं बनेंगे, सीएम बने रहेंगे. माना जाता है कि लेफ्ट का तब का फैसला आत्मघाती साबित हुआ. तब से लेफ्ट सिमटते-सिमटते केरल और दिल्ली के जेएनयू तक सिमट गया. अब वैसा ही एक फैसला लेफ्ट ने विजयन के बारे में लिया है जिसने केरल में चुनाव से पहले सनसनी मचा दी है.

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न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, विधानसभा चुनाव से पहले लोकल चुनावों में हार ने लेफ्ट को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि आगे पी विजयन को कॉन्टीन्यू करना है या नहीं. उन्हें सीएम का दावेदार बनाकर चुनाव लड़ना है नहीं. चुनाव से पहले सीपीएम की सेंट्रल कमेटी ने दो दिन तक मंथन किया. सीपीएम के राष्ट्रीय महासचिव एम ए बेबी ने फैसला सुनाया कि चुनाव में पी विजयन फिर से सीएम प्रोजेक्ट नहीं किए जाएंगे. जीतने के बाद तय होगा कि कौन सीएम बनेगा. हालांकि एलडीएफ विजयन की लीडरशिप में ही चुनाव लड़ेगा. 

एक और बड़ा फैसला ये कि 80 साल के विजयन विधानसभा चुनाव लड़ेंगे या नहीं, ये भी उचित समय पर तय किया जाएगा. अगर चुनाव जीते तो सीएम का फैसला चर्चा के बाद लिया जाए. चुनाव में सीपीएम किसी को सीएम प्रोजेक्ट नहीं करेगी. हालांकि चुनाव विजयन सरकार के अचीवमेंट्स को आधार बनाकर ही लड़ा जाना है. लेफ्ट में सत्ता में कोई भी हो चाहे सीएम पद पर ही क्यों न हो, उसकी नहीं चलती. चलती पार्टी के पोलित ब्यूरो की है.

विजयन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सीपीएम नेता के हैं लेकिन सुप्रीम लीडर महासचिव एम ए बेबी हैं. विजयन पार्टी की सबसे बड़ी डिशिशन मेकिंग बॉडी पोलित ब्यूरो के सदस्य भर हैं. विजयन मई 2016 से केरल के सीएम  हैं. वो केरल के पहले ऐसे सीएम  हैं जिन्होंने 5 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा 2021 में भी सत्ता हासिल की. 

सीटिंग सीएम को अगले चुनाव में सीएम प्रोजेक्ट करना कांग्रेस के यूडीएफ अलायंस के लिए बड़ा बूस्टर बन सकता है. यूडीएफ को कहने का मौका मिल जाएगा कि अगली बार विजयन सीएम नहीं बनेंगे. इसलिए नहीं बनेंगे कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें सीएम रिपीट नहीं करने का फैसला किया है. चुनावों में सबसे बड़े नेता का यूं रास्ते से हट जाना यूडीएफ की बड़ी जीत की तरह है. फैक्ट शीट ये है कि 2016 और 2021 में लेफ्ट ने बैक टू बैक विधानसभा, फिर लोकल चुनाव जीते लेकिन 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में यूडीएफ की शानदार जीत होती रही.

10 साल में पहली बार ऐसा हुआ जब सत्ताधारी एलडीएफ लोकल चुनाव नहीं जीत पाया. केरल में लोकसभा चुनावों के बाद कई विधानसभा उपचुनावों और लोकल बॉडीज इलेक्शन में लेफ्ट की हार का खामियाजा सीएम विजयन के मत्थे मढ़ा जा रहा है. विजयन जिताऊ नहीं रहे शायद इसीलिए पार्टी ने पर कतरे हैं. पार्टी ने रिस्क लिया है. चुनाव बाद ही पता चलेगा कि फैसला सही था या नहीं.

पी विजयन की कहानी  शून्य से शिखर तक पहुंचने की है. बेहद गरीब परिवार में जन्म लेने से लेकर लगातार दूसरी बार केरल की सत्ता संभालने तक का उनका सफर किसी फिल्मी स्टोरी से कम नहीं. विजयन के नाम पी मतलब पिनाराई इसलिए जुड़ा क्योंकि उनका जन्म कन्नूर जिले के पिनाराई गांव में हुआ. 1945 में जब जन्म हुआ तो उनका परिवार मुश्किल से गुजर-बसर करता था. पिता मुंडयिल कोरन ताड़ी निकालने वाले थे. जिस परिवार में विजयन का जन्म हुआ उसमें 14 बच्चों ने जन्म लिया लेकिन जीवित केवल तीन रहे. स्कूलिंग के बाद इकोनॉमिक्स में डिग्री ली. खर्चा निकालने के लिए बुनकर बने. कॉलेज पहुंचने पर लेफ्ट से परिचय टर्निंग प्वाइंट बना. थालास्सेरी के ब्रेनन कॉलेज में पढ़ते हुए छात्र राजनीति में सक्रिय हुए. 1964 में केरल स्टूडेंट फेडरेशन जो बाद में SFI बना के नेता बने. तब केरल में लेफ्ट की जड़ें मजबूत थी. विजयन सीपीएम में शामिल होकर उसके स्टूडेंट विंग में सक्रिय हो गए. 

25-26 साल की उम्र में पार्टी के टिकट विजयन को 1970 में पहला विधानसभा चुनाव कूथुपरंबा सीट से लड़ा और जीते. 1975 में इमरजेंसी में गिरफ्तार हुए और जेल में खूब यातनाएं झेली. 1977 में जेल से रिहा होने के बाद विजयन फिर से विधायक चुने गए. उन्होंने विधानसभा में अपनी खून से सनी कमीज लहराते हुए पुलिस की बर्बरता के खिलाफ एक ऐतिहासिक और भावुक भाषण दिया, जिसने उनकी इमेज बदल दी.

केरल में लेफ्ट को ऐसा नौजवान मिला जो जमीनी भी था और डेयरिंग भी. उसी इमेज ने एक दिन विजयन को केरल में टॉप पोजिशन पर पहुंचा दिया. उन्होंने सबसे लंबे समय तक 1998 से 2015 तक 17 सालों तक सीपीएम सचिव का कार्यकाल पूरा किया. 6 चुनाव लड़े उनमें से एक भी नहीं हारे. केरल की राजनीति में दशकों से एक परंपरा रही  कि हर पांच साल में सरकार बदल जाती थी. लेकिन 2021 के विधानसभा चुनावों में विजयन ने इस रिवाज़ को बदल दिया. उनके नेतृत्व में LDF ने दोबारा सत्ता हासिल की, जो केरल के 40 साल के इतिहास में पहली बार हुआ था. 

विजयन की इमेज ईमानदार नेता की रही लेकिन पिछले कुछ वक्त में क्लीन इमेज को बड़ा धक्का लगा. विजयन का अपना छोटा सा परिवार है जिसमें पत्नी कमला और टी वीणा और बेटा विवेक हैं. विजयन के अलावा उनके परिवार से कोई भी राजनीति में नहीं हैं.

अब ये कोई संयोग है या प्रयोग है कि केरल में विधानसभा चुनावों से पहले विजयन का परिवार पत्नी कमला को छोड़कर करप्शन के आरोपों में ईडी के लपेटे में आ चुका है. वीणा और विवेक भी ईडी की जांच के घेरे में हैं. खुद विजयन के पीछे मसाला बॉन्ड को लेकर ईडी पड़ी है. केरल में ये चर्चा रही है कि उन्होंने बीजेपी से डील की हुई है इसलिए ईडी की जांच के बाद भी उन्हें और  उनके बच्चों को ईडी ने बख्शा हुआ है. 

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