ब्राह्मणों से मायावती का सिर्फ सियासी नहीं भावनात्मक रिश्ता भी है; जानें उस भाई की कहानी जिसके लिए फूट-फूट कर रोई थीं बहनजी

UP Politics: यूपी की राजनीति में मायावती और ब्राह्मण समाज के रिश्ते की कहानी एक बार फिर चर्चा में है. जानें 1995 के गेस्ट हाउस कांड में ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने कैसे मायावती की जान बचाई, 2007 की सोशल इंजीनियरिंग का असर और 2027 चुनाव से पहले ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर क्या संकेत मिल रहे हैं.

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक वेब सीरीज 'घूसखोर पंडत' को लेकर भारी बवाल मचा हुआ है. ब्राह्मण समाज के अपमान से जोड़कर देखे जा रहे इस विवाद में बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया है. मायावती ने न केवल इस पर बैन की मांग की, बल्कि यह भी कहा कि ब्राह्मण समाज को अब किसी की 'बाटी-चोखा' की जरूरत नहीं है. मायावती का यह बयान एक बार फिर यूपी में 'ब्राह्मण-दलित' गठजोड़ की चर्चाओं को हवा दे रहा है.

2007 का वो ऐतिहासिक 'सोशल इंजीनियरिंग'

मायावती और ब्राह्मण वोटर्स का रिश्ता बेहद पुराना और गहरा है. साल 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने 'सोशल इंजीनियरिंग' का ऐसा फार्मूला पेश किया था जिसने राज्य की राजनीति बदल दी. उस वक्त नारे लगे थे- 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है.' करीब 80 से 90 प्रतिशत ब्राह्मण वोटर्स मायावती के साथ आए थे, जिसके दम पर 16 साल बाद उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी.

जब 'संकटमोचन' बने थे ब्रह्मदत्त द्विवेदी

मायावती का ब्राह्मण समाज से रिश्ता केवल वोटों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके पीछे एक गहरा भावनात्मक इतिहास भी है. यह बात है 2 जून 1995 के 'गेस्ट हाउस कांड' की. लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्टेट गेस्ट हाउस में जब सपा कार्यकर्ताओं की भीड़ ने मायावती पर हमला किया था, तब बीजेपी नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने अपनी जान पर खेलकर उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला था.

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ब्रह्मदत्त द्विवेदी के निधन पर फूट-फूट कर रोई थीं मायावती

ब्रह्मदत्त द्विवेदी को मायावती अपना 'धर्म भाई' मानती थीं और उन्हें राखी बांधती थीं. उनके बीच का रिश्ता इतना मजबूत था कि मायावती ने कभी ब्रह्मदत्त द्विवेदी के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारा, बल्कि खुद उनके लिए चुनाव प्रचार करने भी गईं. जब 1997 में ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या हुई, तो मायावती सार्वजनिक रूप से फूट-फूट कर रोई थीं. यह तस्वीर आज भी यूपी की राजनीति में एक अमिट याद के रूप में दर्ज है.

क्या 2027 में फिर दिखेगा हाथी-शंख का साथ?

वर्तमान सियासी हालात में जब ब्राह्मणों की कथित नाराजगी को लेकर चर्चाएं तेज हैं, मायावती का वेब सीरीज विवाद पर मुखर होना एक बड़ा संकेत माना जा रहा है. 2022 के चुनाव से पहले भी सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में प्रबुद्ध सम्मेलनों के जरिए ब्राह्मणों को जोड़ने की कोशिश हुई थी. अब 2027 के चुनाव से पहले मायावती का यह रुख बताता है कि वे अपने पुराने और भरोसेमंद वोट बैंक को फिर से साधने की तैयारी में हैं.

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